Dekho or Jaano
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स्वागत है आपका
सभी दोस्तों को एक बार फिर मेरा नमस्कार।
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स्वागत है आपका
दोस्तों अब हम गांव के इतिहास बारे में जानेंगे। यह आपके लिए बहुत ही दिलचस्प कहानी होगी।
यह इतिहास हैं एक छोटे से गांव का। यह गांव एक छोटी पहाड़ी के ऊपर बसा हुआ है जो रणथम्भोर सेंचुरी में आता है। इस गांव में कम ही लोग रहते है। यह गांव भारत देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के बूंदी जिले में गेण्डोली के पास पड़ता है। इसका पुराना नाम गनपतगढ़ था। वर्तमान में इसको गुंथा के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह गांव दो भागों में में बटा हुआ है। निचे का भाग झोंपड़ा के नाम से जाना जाता है और दोनों भाग मिलकर गुंथा के नाम से जाने जाते है। यह मध्य काल के समय सौलंकी राजपरिवार की राजधानी रही है। यह सब यहां रखे शिलालेखों से चलता है। यहां मध्य कालीन मंदिर भी बने हुए है। बरसात के दिनों में यह गांव बहुत ही खूबसूरत नज़र आता है.
यदि प्राचीन समय की बात की जाय तो यहां के लोगो का रहन सहन सामान्य था। लोक कहावतों के अनुसार यह पता चलता है की सभी लोग आपस में मिल जुल कर रहते थे यहां पर भी राजा हुआ करते थे लेकिन इनका लिखा लेख मौजूद नहीं है। सोलंकी राजाओ और विदेशी आक्रमणों के कारण यहां का जन जीवन बहुत अस्त व्यस्त था। सोलंकी राजाओ ने महल आदि बनवाए लेकिन वर्तमान समय में उनके कुछ अवशेष ही रह गए। कहा जाता है की इन महलो के पास गांव का हाट भरा जाता था। इस हाट में दूर दूर से लोग आते थे। सोलंकियो के ही काल में इस तालाब का पक्का निर्माण शुरू किया गया। इस तालाब के निर्माण में बड़े बड़े शिलाओं का प्रयोग किया गया था। वर्तमान में सरकार के द्वारा इस तालाब का जीर्णोद्धार किया गया है क्युकी यह पूरी तरह से जीर्ण हो चूका था। इसके बाद अब पुरानी बनावट अब देखने को नहीं मिलेगी।
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| बाबा हाड़ा जी |
तालाब के किनारे एक राजा का चबूतरा है जिसमे उनकी मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति में घोड़े पर सवार राजा, हाथ में भाला लिए हुए तथा इसके आगे इनकी चार ओरतो का चित्र है। और इस चबूतरे को बाबा हाड़ा जी के नाम से जाना जाता है। इस मूर्ति के नीचे कुछ लिखा हुआ है जिसको पढ़ा नहीं जा सका।
इसी जगह के थोड़ी दूरी पर एक समाधी बनी हुई है। इस जगह को बाबा लांगड़ा जी के नाम से जाना जाता है।
अगर तालाब की बात की जाय तो यह 120 बीघा पर फैला हुआ है। इसमें बरसात का पानी आता है। जब यह पूरी तरह भर जाता है तब बहुत ही मनमोहक देखने लायक नज़ारा बन जाता है।
अगर तालाब की बात की जाय तो यह 120 बीघा पर फैला हुआ है। इसमें बरसात का पानी आता है। जब यह पूरी तरह भर जाता है तब बहुत ही मनमोहक देखने लायक नज़ारा बन जाता है।
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| तालाब का विहंगम नज़ारा |
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| गुंथा जल प्रपात |
इस तालाब में ऊपर पहाड़ी से पानी लाने के लिए मोर व गज नामक दो लोगो के द्वारा बड़ी बड़ी शिलाओं को काटकर नाले का निर्माण किया गया जिसको मोरगज के नाम से जाना जाता है। एक ओर प्रमाण यह भी है की इस मोरगज के अंदर एक बड़ी चट्टान पर शैलचित्र भी देखने को मिलता है। इस शैलचित्र में मोर व हाथी का चित्र है। सम्भवतः इस नाले को इसी नाम से जाना जाता हो। इनके अलावा यहां पर एक दहाड़ते शेर, बैठा बंदर और मान शब्द भी मिलता है।
इस मोरगज को गुंथा जल प्रपात के नाम से भी जाना जाता है। बारिश के दिनों में यह झरने की तरह बहने लगता है।
इस तालाब के निर्माण से पहले, तालाब के मध्य में एक छतरी बनी हुई है जो वर्तमान समय में मिटटी में दब गयी है। इस छतरी का निर्माण सोलंकी राजाओ से भी पहले का है। तालाब के उत्तरी छोर पर पहाड़ी के ऊपर सोलंकी राजाओ का निवास स्थान था। उनके द्वारा बनवाए गए महल थे। लेकिन इस समय तो उनके खंडित महल ही है जो पूरी तरह से नष्ट हो गए है।
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| हाड़ाओं द्वारा निर्मित महल |
इनके बाद आये हाड़ाओं ने दूसरी जगह पर महल का निर्माण करवाया। इस महल के दो भाग है। एक भाग में राजा व रानी का निवास था। यह दो मंजिला बना हुआ है तथा दूसरे भाग में अन्य कार्य होते थे। महल के पास में एक ऊँचा प्रहरी चबूतरा बना हुआ है जिसके द्वारा दूर दूर की गतिविधियों पर नज़र रखी जाती थी। थोड़ी दुरी पर ठाकुरजी के मंदिर के पीछे एक और चबूतरा बना हुआ है। इसमें गांव के पंच अपने फैसले सुनाते थे।
गांव के बाहर युद्ध लड़ने के लिए एक बहुत बड़ा रणक्षेत्र है। इसमें बहुत सारी प्रतिमाएं पड़ी हुई है। इन प्रतिमाओं में युद्ध के दृश्यों को दिखाया गया है। इन प्रतिमाओं को देवळा के नाम से जाना जाता है तथा इस जगह को देवरालो के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में यह जगह वनविभाग में आरक्षित है।![]() |
| मंडी के महादेवजी |
गांव के उत्तरी छोर पर पहाड़ी पर दो चूने की भट्टियां भी है। इन भट्टियों के द्वारा सोलंकी और हाड़ाओं के समय तालाब के निर्माण के लिए चूना बनाया जाता था।
तालाब के किनारे मेघवाल जाति सती माँ का चबूतरा भी बना हुआ है। गुंथा मोड़ के पास तालाब के किनारे पीर बाबा की मस्जिद भी बनी हुई है। इससे यह पता चलता है की गांव में उस ज़माने में भी साम्प्रदायक समाज था और आज भी है।
गांव के दोनों भागो के मध्य, श्मसान घाट के पास एक चबूतरा बना हुआ है जिसको हड़ताल चबूतरे के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है की यहां पर लोग बैठ कर राजा के खिलाफ धरना देते थे। इस चबूतरे में महादेवजी की पिंड है।
गांव के उत्तरी भाग पर खानों के पास एक और चबूतरा बना हुआ है जिसको बाबा काला जी के नाम से जाना जाता है।
तालाब के किनारे मेघवाल जाति सती माँ का चबूतरा भी बना हुआ है। गुंथा मोड़ के पास तालाब के किनारे पीर बाबा की मस्जिद भी बनी हुई है। इससे यह पता चलता है की गांव में उस ज़माने में भी साम्प्रदायक समाज था और आज भी है।
गांव के दोनों भागो के मध्य, श्मसान घाट के पास एक चबूतरा बना हुआ है जिसको हड़ताल चबूतरे के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है की यहां पर लोग बैठ कर राजा के खिलाफ धरना देते थे। इस चबूतरे में महादेवजी की पिंड है।
गांव के उत्तरी भाग पर खानों के पास एक और चबूतरा बना हुआ है जिसको बाबा काला जी के नाम से जाना जाता है।
गांव के पीछे की तरफ एक छोटी सी पहाड़ी है जिसको फुटिया मंदिर की डूंगरी कहा जाता है। यहा पर सौलंकी राज परिवार से भी पहले का एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था। अब तो इस मंदिर के अवशेष ही मिलते है। इस मंदिर का झण्डा रोपने का पीछे का भाग वर्तमान में तेजाजी के चबूतरे के पीछे लगा हुआ है।
कहा जाता है की एक बार इन्द्रगढ़ के राजा की बेटी का विवाह बूंदी के राजकुमार के साथ हुआ तो वह जब भी इस मार्ग से गुजरती थी, तो उसको रास्ते में पानी पीने की समस्या होती थी। और इसी रानी के द्वारा तालाब के के किनारे सगसजी महाराज के सामने एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया।
कहा जाता है की एक बार इन्द्रगढ़ के राजा की बेटी का विवाह बूंदी के राजकुमार के साथ हुआ तो वह जब भी इस मार्ग से गुजरती थी, तो उसको रास्ते में पानी पीने की समस्या होती थी। और इसी रानी के द्वारा तालाब के के किनारे सगसजी महाराज के सामने एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया।
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धन्यवाद







Nice effort.. keep sharing
ReplyDeleteVisit gendolidekho.com also
agr gav ke bare me or kuch jankari ho to mujhe btay
ReplyDeleteKay bat had bhai
ReplyDeletebahut accha blog h
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